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बासमती चावल 1121 सहित बारीक धान व चावल में मंदे की संभावना नहीं

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नई दिल्ली, (सुभाष भारती):
बासमती चावलों व धान में सरपट तेजी नहीं बन पा रही है, इसका मुख्य कारण यह है कि मार्किट में रूपये की भारी तंगी के चलते व्यापारियों की स्टॉक करने की क्षमता कम हो गई है। दूसरी ओर नीचे वाले भाव से बाजार काफी तेज होने के बाद ठहर-सा गया है तथा इसमें पिछले 15 दिनों में बासमती चावलों के रेट 100/150 रूपये ऊपर-नीचे होते रहे हैं। राइस मिलों में धान की भारी कमी होने से मंदे भाव पर पड़ता नहीं लग रहा है तथा ज्यादा ऊँचे भाव में निर्यातक माल नहीं खरीद रहे हैं। डोमेस्टिक मार्केट में ग्राहक न होने से निर्यातकों की मोनोपली चल रही है, लेकिन धान की किल्लत से वर्तमान भाव में कोई रिस्क नहीं है।
गौरतलब है कि औसतन बरसात पूरे देश में सामान्य से कुछ अधिक ही हुई है, लेकिन समयानुकूल न होने से धान की फसल में लगभग 30-35 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इस बार जुलाई व अगस्त में उत्तर भारत के यूपी, हरियाणा, पंजाब व आधे मध्य प्रदेश में अच्छी बरसात हुई। बिहार में भी उक्त अवधि के अंतराल अच्छी बरसात हुई, लेकिन सितम्बर व अक्तूबर दोनों महीनों में पूरी तरह सूखा रहने से तैयार धान की पैदावार 30-35 प्रतिशत कम हुई है। यही कारण है कि मंडियों में धान की ढेरियां तो ऊँची-ऊँची दिखाई देती थीं, लेकिन मिलिंग के बाद चावल की उपलब्धता कम रही। व्यापारी एवं किसानों के अनुमान के मुताबिक इस बार बासमती प्रजाति के धान का उत्पादन 635-640 लाख टन से घटकर 510-520 लाख टन रह गया जिसमें चावल उत्पादन केवल 305-310 लाख टन रह गया है। इसमें भी पतला धान होने के कारण 5 प्रतिशत टुकड़ा माल अधिक बना है, जिससे बढिय़ा सेला व स्टीम एवं कच्चा बासमती चावल की उपलब्धि कम रही है। दूसरी ओर 1509 की पकाई इस बार 1121 के स्टीम से बढिय़ा आ रही है, जिससे इसका स्टीम चावल लगभग बराबर भाव पर बिक रहे हैं, वहीं 1121 सेला 500 रूपये ऊंचा बिक रहा है। इस समय इसका सेला 6800 रूपये एवं 1509 सेला 6300 रूपये बिक रहा है, जबकि दोनों का स्टीम 7200/7300 रूपये थोक में चल रहे हैं। धान के भाव भी उक्त दोनों प्रजाति के 3150/3200 रूपये तथा 3600/3650 रूपये चल रहे हैं। इसके इलावा 1401 तथा 1408 धान की आवक मंडियों में काफी कम रह गई है। दूसरे उत्पादक देशों में भी चावल की लैंथ कम आ रही है, जिससे भारतीय चावल का निर्यात रूक-रूककर चल रहा है। बाजार में रूपये की तंगी होने से डोमेस्टिक व्यापार काफी घट गया है। इसका लाभ उठाकर निर्यातक चलते बाजार को सिंडीकेट बनाकर रोक देते हैं, लेकिन मंडियों में धान की आवक बहुत कम हो गई है। चावल मिलों में चावल का स्टाक भी अधिक तैयार नहीं है। यही कारण है कि बारीक प्रजाति के चावल में दूर-दूर तक मंदा नजर नहीं आ रहा है।


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