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बासमती चावल की जमीनी स्तर में मंदा नहीं है- माल खरीदने में देरी न करें- सतर्कता जरूरी

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नई दिल्ली, (सुभाष भारती):
बासमती चावलों की मार्कीट में चल रही मंदी को देखते हुए हर व्यक्ति को ऐसा लग रहा है कि चावल इस बार मंदे में ही रहेंगे लेकिन ऐसा नहीं होगा क्योंकि बासमती चावलों में जमीनी स्तर पर मंदे की कोई संभावना नहीं है तथा थोड़ी-सी ग्राहकी निकलते ही इसका बाजार पुन: तेजी की ओर बढऩे की संभावना लग रही है। इसके दो प्रमुख कारण हैं, पहला गत वर्ष का पुराना स्टॉक नई फसल आने पर पूरी तरह समाप्त हो गया था। दूसरा चालू वर्ष की फसल भी 30 प्रतिशत कम है जिसके चलते व्यापार में भरपूर लाभ दिखाई दे रहा है, बशर्ते कि निर्यात मांग अच्छी रहे।
विगत दो वर्षों में कृषि के अनुकूल जलवायु नहीं बन पा रहा है जिसके चलते बासमती धान का उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है। गौरतलब है कि औसतन बरसात पूरे देश में सामान्य से कुछ अधिक ही हुई है, लेकिन समयानुकूल न होने से धान की फसल में कमी दर्ज की गई है। इस बार जुलाई व अगस्त में उत्तर भारत के यूपी, हरियाणा, पंजाब व आधे मध्य प्रदेश में अच्छी बरसात हुई। बिहार में भी उक्त अवधि के अंतराल में अच्छी बरसात हुई, लेकिन सितम्बर व अक्तूबर दो महीने पूरी तरह रहने के कारण तैयार धान की फसल 30 प्रतिशत की कमी आई है। यही कारण है कि मंडी में धान की ढेरियां तो ऊँची-ऊँची दिखाई देती थीं, लेकिन मिलिंग के बाद चावल की उपलब्धता कम रही। व्यापारी एवं किसानों के अनुमान के मुताबिक इस वर्ष बासमती प्रजाति के धान का उत्पादन 635-640 लाख टन से घटकर 550-560 लाख टन रह गया जिसमें चावल उत्पादन 325-350 लाख टन रह गया। इसमें भी पतला धान होने से 5 प्रतिशत टुकड़ा अधिक बन रहा है, जिससे बढिय़ा सेला व स्टीम एवं कच्चे बासमती चावल की उपलब्धि कम रही है। दूसरी ओर 1509 की पकाई इस बार 1121 के स्टीम से बढिय़ा आ रही है, जिससे इसका स्टीम चावल लगभग बराबर भाव पर बिक रहे हैं। वहीं 1121 सेला 500 रूपये ऊँचा बिक रहा है। इस समय इसका सेला 6800 रूपये एवं 1509 सेला 6300 रूपये बिक रहा है, जबकि दोनों का स्टीम 7000/7100 रूपये थोक में चल रहे हैं। धान के भाव भी उक्त दोनों प्रजाति के 3150/3200 रूपये तथा 3600/3650 रूपये चल रहे हैं। इसके इलावा 1401 तथा 1408 धान की आवक मंडियों में काफी कम हो गई है। दूसरे चावल उत्पादक देशों में भी चावल की लैंथ कम आ रही है, जिससे भारतीय चावल का निर्यात रूक-रूककर बढ़ रहा है। बाजार में रूपये की तंगी होने से डोमेस्टिक व्यापार काफी घट गया है। इसका लाभ उठाकर निर्यातक चलते बाजार को सिंडीकेट बनाकर रोक देते हैं, लेकिन मंडियों में धान की आवक टूट गई है। चावल मिलों में राइस भी तैयार अधिक नहीं है। यही कारण है कि बारीक प्रजाति के चावल में दूर-दूर तक मंदा नहीं है। इसके साथ-साथ मोटे चावल में भी मंदे का व्यापार नहीं करना चाहिए क्योंकि निर्यात में इंसेंटिव मिलने से मोटे चावल का निर्यात लगातार चल रहा है तथा अभी आगे भी निर्यात बढऩे की संभावना नजर आ रही है। 
नोट: फिर भी चावल व्यापारी अपना व्यापार सावधानी व सतर्कता से करें।


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